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Sunday, March 4, 2018

कविताएँ--सुरभी आनंद


          दुर्ग जा रही है
  
        कलरव ध्वनियों ने गूँज उठाया 
        जगत जीव द्वंद बनाने का 
        हवन की खुशबू तेरी ओर से आई 
        मुझे अनुभव जगाने का 

        कहीं चावल कहीं गुग्गुल कहीं पुष्प 
        सब बिखरे हैं तेरे विलाप में 
        कंर्दन की आवाज सुन 
        मेरी भाव भंगिमाएं चीख पड़ी 
        तू जा रही है ;विस्मयताद्ध

        आज ज्योत की आजमाइशें 

दो कविताएं : शैलेंद्र क र विमल

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