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Saturday, November 11, 2023

छोटा भी सुन्दर : रंजीत कुमार साहू

 

छोटे और दुर्बल का 
कभी न करो 
जाने अनजाने में 
उपहास  
छोटा सा दिया 
घनघोर अँधेरे में  
जगा जाता  है  
जीवन की   आस 

धीमा होता है पर 
बदल देता है  
रुख  मौसम का झोंका  
हवा का 
कौन कहता है  वो निर्बल होता है  
घूप में काम देता है दवा का 

छोटा सा ही होता है  सीपी सागर में, 
मोती  उस से भी है छोटा होता 

Wednesday, September 6, 2023

सावन की छवि : रंजीत कुमार साहू

नभ ने संदेश भेजा सागर को 

तृषा से धरती जल रही है  
जीवन की डोर ढीली हो रही है 
प्राणी की  सांस  मचल रही है 
सौगात भेजा है सागर ने आज 
उमड़ पड़ा है बादलों का झुंड 
फिर आकाश  चूमने लगा है 


गुनगुनाने लगे पहाड़ी झरने 
भीगने लगे है  सूखे पत्थर 
जीवन की आस चैन भरी  सांस 
देखे नयन  भटके जिधर 
फैलाया  धरती आँचल अपना  
बिखरा हरा रंग उस पर 
फिर मौसम  घूमने लगा है 

Monday, April 10, 2023

रंजीत साहू की दो कवियाएँ


गुमसुम हुई शाम सुहानी 


फिर बहकने लगा  फागुन देखो,


टेसू के पेड़ों  से गुजर गया I


ढलती शाम की जलती किरणों में,


इश्क़ का हुनर  बिखर गया !



एक कश्मकश शुरू हुई  दिल में, 


भूलने और याद करने  में I


 फर्क सब कुछ मिटने  लगा है, 


मिट जाने  या ज़िन्दा रहने में  I

दो कविताएं : शैलेंद्र क र विमल

  गुज़रा हुआ ज़माना गुज़रा वक्त चलचित्र है, जैसे संघर्ष अनवरत है, यादों के सताने से हर कोई कोई सकूं मिलता पवित्र सा है, सामान्य वक्त हर ...