हामिद कारज़ाई के देश का चुनाव
ख़बरों की विभीषिका इस बीच
बहुत ज़्यादा रही
काफी कँपाया ख़बरों ने
कुछ आदत भी डाल दी
और कविता दूर रही
इस भयानक आक्रांत समय से
बहुत बौद्धिक रही कविता
जबकि दोनों को पढ़ने का वक़्त
लगभग एक रहा
लेकिन पढ़े लिखे अक्षरों के बने
सब कुछ के अचानक बंद होने का भी वक़्त रहा
कम से कम एक दिन
जो केवल कहे सोचने को
हिंसा के कारणों पर
कि इतनी संभ्रांत हो हिंसा
कि शोध का विषय बन जाए
हमारे अपने अफ़ग़ानिस्तान में
काबुली वालों के देश में