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Saturday, March 16, 2024

'नादान आदमी का सच ’ हमारा तुम्हारा सच - सुजाता


अम्बिका दत्त जी का काव्य –संग्रह ’नादान आदमी का सच ’ पढ़ते ही ताज़ी हवा के झोंके की छुअन सी महसूस होती है। हिंदी और राजस्थानी में उनके नौ पुस्तक–संग्रह (ख़ास तौर पर कविताएं) प्रकाशित हो चुके हैं और वे अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं।’नादान आदमी का सच ’ उनका दसवां काव्य –संग्रह जीवन की विविधता  व नवीनता लिए हमारे समक्ष है।

’ प्रार्थना के लिए प्रार्थना ’ संग्रह की पहली कविता है। एक संवेदनशील व्यक्ति होने के नाते कवि कामना करता है कि लोभ, लिप्सा, मद –मोह, अभिमान और दिखावे से बच कर प्रार्थना जीवन में सहज –शुभ कर्म 

बन कर उभरे।


अम्बिका दत्त जी की कविताओं में गज़ब की सादगी है तथा चिंता भी कि इन दिनों शरीफ़ लोग कितने निरीह व

Saturday, November 11, 2023

नसीहत का सौदा : लघु कथा, सुजाता

  

मां हाथ में एक रुपए का सिक्का लिए बाज़ार निकली।बच्चे की ललचाई आंखें सिक्के पर टिकी थीं–मां! आते समय कुछ लेते आना।राशन की दुकान पर लाइन लगी थी, ताक –झांक करने के बाद वह आगे बढ़ गई।मिठाई की दुकान पर मात्र भाव पूछा।आगे चौराहे पर नसीहतों की नीलामी हो रही थी,उसने सिक्का दे कर एक नसीहत खरीद ली "सहनशीलता अमूल्य

Saturday, August 6, 2022

काला धुआं - लघु कथा :- सुजाता


ऊपर बैठे आकाश ने भी उनकी हां में हां मिलाई। हवा, पानी, ज़मीन बोले, तुम तो मज़े में हो भई, इंसान के हाथ तुम तक  नहीं पहुंच सकते।

आकाश ने अपने दिल में हुआ बड़ा सा छेद दिखाते हुए कहा, तुम्हें शायद मालूम नहीं कि इंसान के स्वार्थ की लपटें कितनी ऊपर तक पहुंच रही हैं।भट्टी में धू –धू जल रहे हैं पुतले, किसी दिन इन्हीं लपटों का शिकार हो जाएगा वह। खतरे का बिगुल बज रहा है और काला धुआं फैलता जा रहा है।

पानी के चेहरे पर उदासी की लकीरें साफ़ दिखाई दे रही थीं। हवा ने पूछा–क्या बात है भाई?  मेरा दर्द बहुत पुराना है–पानी बोला ,बरसों से इंसान मेरा खून चूस रहा है।वह जल–भक्षी हो गया है, इतना स्वार्थी कि मेरे शरीर की आखिरी बूंद तक निचोड़ लेना चाहता है।अब और बर्दाश्त नहीं होता।


पानी की दुःख भरी कहानी सुन कर हवा की आंखें भीग गईं –मेरी भी दास्तां कुछ ऐसी ही है भाई।

Monday, July 18, 2022

'अजय' चयनित कविताएं–एक सफ़र- सुजाता


सुजाता 
अजय जी की कविताओं में हिमाचल की मिट्टी की सौंधी गंध है।पहाड़ी गांव , जनमानस , रीति रिवाज़ , परंपराएं ,जीवन शैली उनकी कविताओं में उभर कर आए हैं, लेकिन वे अनुभव और चेतना के परों पर सवार बहुत दूर निकल गई हैं। वे समकाल की बुलंद आवाज़ हैं, जो अपने समय और उससे जुड़े यथार्थ का प्रतिनिधित्व करती हैं।
संग्रह की पहली कविता   ‘प्रार्थना’ में गजब की सादगी है।

एक आम ग्रामवासी के मुख से सुनिए –

ईश्वर/मेरे दोस्त/मेरे पास आ/यहां बैठ/बीड़ी पिलाऊंगा/चाय पीते हैं । सादगी की यह झलक उनकी और भी कविताओं में मिलती है–‘एक आदमी होता था’  की कुछ पंक्तियां हैं  पहले एक पहाड़ होता था/एक आदमी होता था/लेकिन आदमी इतने ज़ोर से बहा /कि नदी सो गई।

‘भोजवान में पतझड़’ में कवि की मानवीय संवेदनाओं का विस्तार झलकता है– लेटी रहेगी एक कुनकुनी उम्मीद/मेरी बगल में/एक ठंडी मुर्दा लिहाफ के नीचे/कि फूट जाएंगी कोंपले/लौट आएगी अगले मौसम तक/भोजवन में जिंदगी।

आदिवासी बहनों के लिए लिखी कविता ‘ब्यूंस की टहनियों ’ में यही संवेदना औरत के प्रति है –जो जितना दबाओ झुकती जाएंगी/जैसा चाहो लचकाओ लहराती रहेंगी/जब सूख जाएंगी कड़क कर टूट जाएंगी।

क्या स्त्री– पुरुष बराबर हैं? क्या सच है कि औरत सामाजिक  और आर्थिक शोषण का शिकार नहीं? यह कविता ऐसे कई सवालों पर और बड़ा सवाल खड़ा करती है।

Saturday, February 12, 2022

सुजाता की दो कविताएँ



वृक्ष का रोमांच


मां चली गई तुम

पर जाते जाते

कई रिश्तों, रस्मों, रहस्यों से

पर्दे उठा गई

तुम्हारे जाने भर की देर थी

उम्र की कितनी सीढियां चढ़ गई मैं

_तैरना था संबंधों के ताल    मेंजलजीवों की कचोट से बचते हुए

चलना था सड़क के बीचों बीच

खुद को बचाते हुए

असीम आकाश में उड़ना था

Monday, May 14, 2018

कविताएं - सुजाता


समय के तेवर और तस्वीरें

कितनी ही तस्वीरें हैं
घर में बिखरी हुई
एलबमों में बंद
दीवारों पर टंगी
कैद कुछ चौखटों, अलमारियों, दराजों में
धीमे-धीमे सांस लेतीं
बहुत कम हैं
आँखों की चमक बरकरार जिनमें
अधिकतर तो धुंधला गयीं
सपनों के झुरमुटे में

दो कविताएं : शैलेंद्र क र विमल

  गुज़रा हुआ ज़माना गुज़रा वक्त चलचित्र है, जैसे संघर्ष अनवरत है, यादों के सताने से हर कोई कोई सकूं मिलता पवित्र सा है, सामान्य वक्त हर ...