Monday, May 25, 2026

दो कविताएं : शैलेंद्र क र विमल

 गुज़रा हुआ ज़माना


गुज़रा वक्त चलचित्र है,
जैसे संघर्ष अनवरत है,
यादों के सताने से हर कोई
कोई सकूं मिलता पवित्र सा है,

सामान्य वक्त हर कोई भूल जाता है,
घटनाक्रम में कुछ घटनाओं का बसेरा होता है,
जिसमें यादगार पल गढ़ से जाते हैं,
जब जब याद करो, गुदगुदाते नहीं रखते हैं,

कभी कभी गुज़रे वक्त को भूलना होगा,
सरहदों को धूमिल होकर मिटना ही होगा,
एकीकरण ने हकीकत बन कर दिखाया है,
पडोसियों को भी अनुसरण करना होगा,

गुज़रा वक्त कुछ प्रश्नों को दोहराता है,
शायद यह कर लेता, कुछ विशेष परिश्रम कर लेता,
मैं अपने, परिवार व‌ समाज के लिए एक
अद्वितीय उदाहरण बन जाता, प्रेरणा बन जाता,

वक्त ने हमेशा-हमेशा आगाह किया है,
पता नहीं किस जोश में हमनें नजरंदाज किया है,
मेरी मानो तो अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है,
वक्त ने हर पल साथ, दिया है, दिशा दी है, मार्गदर्शन
किया है।


एक संकल्प


एक संकल्प
इतिहास बन‌ सकता है,
दृढ़ निश्चय में विश्वास
घोलकर आश्चर्यचकित कर सकता है,

एक संकल्प के
उदाहरणों की कमी नहीं है,
संकल्पों को दिशा
देकर लक्ष्य प्राप्ति में ही छिपी सफलता की कुंजी है,

एक अध्यापक,
स्वयं उदाहरण बन सकता है,
उदाहरण एक के लिए नहीं,
सभी विधार्थियों को प्रेरणा दे सकता है,

किसी भी लक्ष्य को
विषम परिस्थितियों का सामना करना होता है,
लक्ष्य के परिणामस्वरूप
एक विशिष्ट दृष्टिकोण उत्पन्न होता है,

आओ हम सभी
छोटे छोटे संकल्प, लक्ष्य तय करें,
प्रेरणा प्राप्त करके प्रेरणा का संचार करें,
स्वयं का उत्थान करें, गतिमान करें, गतंव्य का आनंद
प्राप्त करें।



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