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Monday, July 18, 2022

दोहा गीतिका- शकुंतला अग्रवाल 'शकुन' , राजस्थान।

 

नाम~ शकुंतला अग्रवाल "शकुन", लघु कथा,व  छांदसिक रचनाएँ ।

प्रकाशित कृतियाँ- 1.दर्द की परछाइयाँ (2017), 

2. "बाकी रहे निशान" दोहा संग्रह( 2019) , 

3."काँच के रिश्ते" दोहा संग्रह(2020),

4."भावों की उर्मियाँ" कुंडलियाँ  संग्रह (2021) 5. 'लघुकथा कौमुदी' लघुकथा संग्रह(2022)

व अनेक साझा संग्रह

प्रकाश्य:-घनाक्षरी,गीत, कविता व एकांकी संग्रह। 

सम्मान व अलंकरण - हिंदी दिवस पर जिला साहित्यकार परिषद भीलवाड़ा द्वारा "साहित्य सुधाकर"-2018

विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा~ 'विद्यावाचस्पति' सम्मान-2018 में

द्वारकेश साहित्य परिषद कांकरोली द्वारा सम्मानित- 2019, काव्यांचल ग्रुप- 'छंद-रथी'-2019, व फरवरी 2020 में दोहा शिरोमणि सम्मान व अन्य कई सम्मान।


 

दोहा


छंदाधारित गीतिका


मैं मूरख कैसे करूँ, शिव जी का गुणगान?

शब्द पड़े हैं मौन सब,नहीं छंद का ज्ञान।

*

नश्वर जग में हो तुम्हीं,सबके तारणहार,

जान गया इस सत्य को,वो सच्चा- इंसान।

पग-पग पर धोखे यहाँ,कैसे हो विश्वास?

परख सके सबको 'शकुन',ऐसा दो संज्ञान।

*

माया डसती नित यहाँ, घायल होती रूह,

Saturday, September 18, 2021

शकुंतला अग्रवाल 'शकुन' (भीलवाड़ा ,राज.) की कुछ कविताएँ


परिचय:

शिक्षा~ एम.ए.राज विज्ञान, व सी. लिब. जन्म~ 17 मार्च 1963 विधा ~ लघु कथा,व  छांदसिक रचनाएँ ।प्रकाशित कृतियाँ-

1.दर्द की परछाइयाँ (2017), 

2. "बाकी रहे निशान" दोहा संग्रह( 2019) , 

3."काँच के रिश्ते"दोहा संग्रह(2020),

4."भावों की उर्मियाँ" कुंडलियाँ  संग्रह (2021)

व अनेक साझा संग्रह

प्रकाश्य:-घनाक्षरी,गीत, कविता,लघुकथा व एकांकी संग्रह। 

सम्मान व अलंकरण - हिंदी दिवस पर जिला साहित्यकार परिषद भीलवाड़ा द्वारा "साहित्य सुधाकर"-2018

विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा~ 'विद्यावाचस्पति' सम्मान-2018 में

द्वारकेश साहित्य परिषद कांकरोली द्वारा सम्मानित- 2019, काव्यांचल ग्रुप- 'छंद-रथी'-2019, व फरवरी 2020 में दोहा शिरोमणि सम्मान व अन्य कई सम्मान।

Shakuntalaagrwal3@gmail.com

आस घटी नहीं

मैं तुम्हें प्यार करती रही,

पल-पल तुम्हें पाने की

चाहत में डूबती रही,

पर तुमतो भोगते रहे जिस्म को,

मैं रूह से रूह के मिलन की आस में,

क्षण -क्षण मरती रही।

तुम अपने अहम में मगरूर रहे,

मैं त्याग की मूरत बनी रही,

तुम्हें कभी तो होगा  अहसास,

हर क्षण मेरे मन में ये आस पलती रही

तुम,बेलगाम -घोड़े से विचरण

करते रहे।

मै खूँटे  से बंधी रही

कभी तो तुम्हें मेरे समर्पण का संज्ञान होगा, 

दो कविताएं : शैलेंद्र क र विमल

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