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Monday, May 4, 2026

दो ग़ज़लें : मोहन बेगोवाल


1

इश्क़ में दिल का सहारा भी बहुत होता है  

डूबने को तो किनारा भी बहुत होता है  


देर तक क्यों ये निगाहें तुम मिलाते हो भला  

इक ज़रा सा तो नज़ारा भी बहुत होता है  


झूठ कहते हो कि तुम को प्यार है हमसे मियाँ  

हम समझते हैं इशारा भी बहुत होता है  


तुम ज़माने में हमारी बात फैलाओ नहीं  

घर जलाने को शरारा भी बहुत होता है  


राह में वो तीरगी आने नहीं देती कभी  

रोशनी को एक सितारा भी बहुत होता है  


हम नहीं रह पा सकेंगे 'मोहन' तुम्हारे बन के  

दिल को रखना साथ आवारा भी बहुत होता है

2

रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

2122//2122//2122//212


क्या कभी इस से क़बल नश्तर चलाया आप ने?

दिल के हर इक ज़ख़्म पर मरहम लगाया आप ने।

​खो गया था जो कभी लगता नहीं मिल पाएगा,

मुद्दतों के बाद फिर उस से मिलाया आप ने।

​शाम का अंदाज़ कुछ बदला हुआ सा है मगर,

पूछना है वक़्त किस सूरत बिताया आप ने।

​लोग जाने क्यूँ हमें  तो बे-वजह दुख दे गए,

दरगुज़र करना सभी को ये सिखाया आप ने।

​था कोई रिश्ता पुराना उन से शायद आपका,

शेर जब भी गुनगुनाया तब रुलाया आप ने।


दो कविताएं : शैलेंद्र क र विमल

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