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Sunday, November 13, 2022

'डा: आरती कुमारी' सहज में ढली सुर्जन परिक्रिया।

डॉ० आरती कुमारी हिंदी, उर्दू व अंग्रेज़ी में समान लिख रही हैं और अनेक साहित्य पत्रों में छप भी रही हैं। कमाल की बात तो यह है की वह तीनों भाषा मे अपनी सुर्जनात्मिक उर्जा को प्रकट करने के लिए समान महारत रखती हैं। वह एक कवि, ग़ज़लगो के साथ शिक्षाविद भी हैं। उनकी कई रचनाएँ व आलेख राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। उनका काव्य संग्रह ' धड़कनों का संगीत' राजभाषा विभाग द्वारा सम्मानित एवं अभिधा प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। उनके संपादन में 'ये नए मिज़ाज का शहर है' और 'बिहार की महिला ग़ज़लकार' ग़ज़ल संग्रह आया है। उनकी रचनाएँ आकाशवाणी और दूरदर्शन से नियमित प्रसारित होती रहती हैं। आरती कुमारी साहित्य त्रैमासिक पत्र मेघला के संपादकीय मण्डल से जुड़ी रही हैं। उनसे एक साहित्य कान्फ्रेंस में मेरी मुलाकात हुई थी। हिंदी कविता और ग़ज़ल में उनका एक अलग स्थान है। उनके लिए साहित्य रचना एक दिव्य कर्म जैसा है।

Sunday, February 3, 2019

पतझड़ के दरख्तों के साथ एक दिन- जतिंदर औलख


सर्दी का मौसम आपने चरम पर है। पतझड़ बीत रही है। पतझड़ में ना जाने क्यों कभी कभी मन उदास सा हो जाता है, एकेलापन महसूस होने लगता है। बहुत ही सर्द दिन है पर हल्की हल्की धूप दिन के अस्तित्व को सहला रही है जैसे मन में पनप रहे मार्मिक ज़ख्म भरे जा रहे हों।  मैं अपनी बाइक लेकर निकल पड़ा, मैंने मन बना लिया कि पतझड़ के दरख्तों से मिलूंगा उनसे बात करूंगा और उनके कुछ फोटोग्राफ लूंगा।
वैसे मैं बन में कठोर तपस्या कर रहा वो रिखीवर नहीं जो दरख्तों की भाषा जान लेता है। लेकिन ये हर हाल आपके हावभाव समझते हैं

Saturday, February 24, 2018

सम्पादकीय- जतिंदर औलख

 समाज और साहित्यः


साहित्य समाज का अभिन्य अंग होना चाहिए और साहित्य ही इंसान में इंसानियत का संचार करता है। साहित्य चाहे मौखिक हो या लिखत इंसान के अंदर ज्ञान की जोत प्रकाशमान करता है। वही समाज विकसित होता है जो ज्ञानवान इंसानो से भरा हो। साहित्य हमेशा मनों में ज्ञान की रौशनी करता है। 
आज सुख-सहूलियत के सारे साधन मौजूद हैं फिर भी हर मन किसी ना किसी कारणवश बैचौन है। हर इंसान ज्यादा से ज्यादा हासिल करना चाहता है। हर जाति, धर्म और वर्ग अपने-अपने लिए और ज्यादा सुविधाएं हासिल करने में जुटे है।  इंसान बैचौन है तो समाज बिखराव की और बढ़ रहा है ऐसे में मानवीय सोच में क्रांतिकारी बदलाव की जरूरत है जो साहित्य ही ला सकता है। मात्र यही एक राह है जो सृष्टि और इंसान के बीच की बढ़ती दूरी को कम कर सकता है।
पंजाबी में हमने दस वर्ष पहले ‘मेघला’ का आरम्भ किआ जो आज पंजाबी साहित्य में एक अलग मुकाम विकसित कर चुका है। हम खुश हैं के आज यही प्रयास हिंदी में शुरू करने की प्रसन्ता ले रहे हैं जिसमे हमारी कोशिश होगी के मयारी रचनाएँ प्रकाशित कर पाठकों को साहित्य के साथ जोड़ा जाए।  
यह पहला अंक है, जो भी हमसे हो पाया स्वीकार कीजिएगा। देश भर से दोस्तों- लेखकों का भरपूर सहयोग

दो कविताएं : शैलेंद्र क र विमल

  गुज़रा हुआ ज़माना गुज़रा वक्त चलचित्र है, जैसे संघर्ष अनवरत है, यादों के सताने से हर कोई कोई सकूं मिलता पवित्र सा है, सामान्य वक्त हर ...