गुमसुम हुई शाम सुहानी
फिर बहकने लगा फागुन देखो,
टेसू के पेड़ों से गुजर गया I
ढलती शाम की जलती किरणों में,
इश्क़ का हुनर बिखर गया !
एक कश्मकश शुरू हुई दिल में,
भूलने और याद करने में I
फर्क सब कुछ मिटने लगा है,
मिट जाने या ज़िन्दा रहने में I
गुमसुम हुई शाम सुहानी
फिर बहकने लगा फागुन देखो,
टेसू के पेड़ों से गुजर गया I
ढलती शाम की जलती किरणों में,
इश्क़ का हुनर बिखर गया !
एक कश्मकश शुरू हुई दिल में,
भूलने और याद करने में I
फर्क सब कुछ मिटने लगा है,
मिट जाने या ज़िन्दा रहने में I
शीशे के घर में रहने वाले,
करते हैं बात पत्थर की.
पत्थर जब पूजा गया तो,
बढ़ गई औकात पत्थर की...!
वही मंदिर, वही मस्जिद
और वही गुरुद्वारे में था,
हर जगह नज़र आई,
जात एक ही पत्थर की.....!
शीशे का होकर रिश्ता,
शीश महल जैसा था,
हो गया चूर जब लगी,
उसे घात पत्थर की...!
पत्थरों के शहर में ,
पत्थर जैसे लोग मिले,
फलदार पेड़ों को मिली,
(आज मेरी सेवानिवृत्ति का एक वर्ष पूरा हो गया है)
परिवर्तन क्या है, बेहतरीन एहसास हो रहा है
ज़िन्दगी का हर पड़ाव प्रभावशाली रहा है,
अनुभवों को मैंने हर स्तर पर सांझा किया है
उम्मीद, उल्लास और उमंग से
जीने की मन में आज भी ललक जिंदा है।
जिंदगी को एक बात और कहनी है,
उम्मीद रखकर जीनी आगे बढ़ रही जिंदगानी है,
अपराध बोध से उठकर के हमें जीना है
(शैलेंद्र , प्रयागराज)
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का आज 123वां जन्मदिन है ।आज ही अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस एवं बसंत ऋतु का दौर भी है।हिंदी साहित्य के छायावाद के चार कवियों, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा के साथ सूर्यकांत जी प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने बंग्लाभाषी होते हुए भी हिंदी साहित्य की,और गीत, कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध आदि विधाओं में रचनाएं सृजित कर छायावाद व परवर्ती काव्य आन्दोलनों के साहित्यकारों का मार्ग दर्शन किया।
सूर्यकांत जी का जन्म रविवार के दिन बंगाल की महिषादल रियासत, मिदनापुर में हुआ। रविवार के दिन पैदा होने के कारण उनका नाम सूर्यकांत रखा
मैं जब भी उनकी दुकान पर जाता
वे नामी बाबाओं के
वीडियो देखते - सुनते हुए ही मिलते थे।
उनमें से कुछ बाबा आज ---- की हवा खा रहे हैं।
आज जब मैं उनकी दुकान पर पहुंचा
तब भी वे कोई वीडियो ही देख रहे थे।
मैने पूछा- कौन से बाबा को देख - सुन रहे हैं ?
वे बोले - अरे नहीं, पिक्चर चल रही है।
मैने पूछा - कौन सी ?
तो वे बोले - फर्जी।
(राजेन्द्र ओझा, रायपुर, छत्तीसगढ़)
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पुरस्कृत होने पर गदगद हरिंदर का कहना है कि किसी की सेवाओं को इस तरह मान्यता दी जाए तो उसको और भी समर्पण भाव से सेवा करने की प्रेरणा मिलती है। शेष लोग भी अच्छे काम के लिए प्रेरित होते हैं।
उनका कहना था कि वह सेवा के जज्बे को लेकर ही बड़ी-बड़ी हैं। उनके दादा पिता भाई व परिवार के अन्य लोग जन सेवा ही करते और कर रहे हैं । उनके अनुसार जब उन्होंने जी एन एम कोर्स पूरा किया तो पिताजी ने सिर पर हाथ रख कर कहा था पुत अपने जीवन को समाज सेवा में लगा दो। बडहेड़ी बटेरला सेक्टर 41 चंडीगढ़ में जन्मी हरिंदर नेसे क्टर 21 के मॉडल स्कूल से स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद एमसीएम कॉलेज से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद उन्होंने गवर्नमेंट राजेंद्र मेडिकल कॉलेज पटियाला से 1990 र्में जीएमएन का कोर्स किया। इसके बाद वही नियुक्त हो गई । वर्ष 2001 से सेक्टर 16 के सरकारी अस्पताल में कार्यरत हैं।
मानव सेवा का कार्य क्योंकि हरिंदर कौर ने शौक से अपनाया था इसीलिए उन्होंने नौकरी पूरी तन्मयता से करने का बीड़ा उठाया हुआ है। सबसे बड़ी चुनौती कोरोना कॉल में आई । चंडीगढ़ का पहला कोरोना मरीज मनदीप उन्हीं के अस्पताल में आया था और उन्होंने बाकी टीम सदस्यों के साथ उसके इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी ।
चंडीगढ़ की स्वास्थ्य व परिवार कल्याण निदेशक डॉक्टर अमनदीप कौर कंग उनकी लगन देखते हुए हरिंदर कौर को कोविड- प्रभावित गर्भवती महिलाओं की सेवा के लिए मुझे गायनी यूनिट में ले आई । इसके लिए अस्पताल में विशेष प्रसूति कक्ष बनाने में भी हरिंदर कौर ने बढ़-चढ़कर योगदान किया।
हरिंदर कौर बताती हैं कि अस्पताल में कोविड-19 रोगियों के लिए क्यूबिकल्स के निर्माण के दौरान उन्होंने लेबरके साथ मिलकर काम किया।
कोरोना जितना बड़ा चैलेंज था उतना ही उन्होंने खुद को इसके मरीजों के उपचार के लिए तैयार किया। कोविड-19 प्रभावित गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी व प्रसूति के बाद उनकी और नए जन्मे बच्चों की देखभाल के लिए उन्होंने इनके साथ अपने आपको भी पूरी तरह समर्पित कर दिया। ड्यूटी के समय का कोई ध्यान ना करते हुए उन्होंने दिन रात सेवा की। जब वह थकावट से गिर जाती तो उनके सहयोगी चिकित्सक उन्हें उठाते और वह फिर नए उत्साह से उपचार कार्य में लग जाती। इस दौरान डॉ रमनदीप कौर ,डॉ सुमन, डॉक्टर बरिंदरजीत कौर, डॉक्टर सपना, डॉ अपूर्वा, डॉक्टर गुन्चु और सिस्टर गुरमीत ने बढ़-चढ़कर भूमिका निभाई। इस दौरान हरिंदर कौर को कई कई दिन अस्पताल में ही रहना पड़ता।
हरिंदर कौर को इस बीच परिवार का भी पूरा सहयोग मिला । थकी मांदी मोहाली में अपने घर पहुंचती तो सरकारी सेवा में कार्यरत पति और बेटे का पूरा साथ मिलता। यह लोग उनकी ड्यूटी को समझते इसीलिए इसे निभाने में उनका पूरा साथ देते।
कोरोना रोगियों के उपचार में सेक्टर 16 का अस्पताल काफी मशहूर हो गया था । चंडीगढ़ के अतिरिक्त मोहाली पंचकूला और आसपास के लोग भी कोरोना उपचार के लिए इसी अस्पताल में भेजे जाने लगे। हरिंदर कौर के अनुसार इस दौरान कोविड-19 प्रभावित करीब ढाई सौ गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी इसी अस्पताल में करवाई गई । उनका कहना है कि उनकी ही टीम ने सामान्य प्रसूति के अलावा इन महिलाओं के सिजेरियन बी करवाए । प्रसूति के बाद मां और बच्चे की देखभाल भी पूरी निष्ठा के साथ की गई ।
हरिंदर कौर की अथक सेवा को देखते हुए पंजाब के राज्यपाल और चंडीगढ़ के प्रशासक बनवारीलाल पुरोहित ने 26 जनवरी , 2020 को राज्य स्तरीय कार्यक्रम में पुरस्कृत किया ।
राष्ट्रीय लक्ष्य कार्यक्रम के तहत जब मेटरनिटी केयर प्रोग्राम शुरू किया गया तो सेक्टर 16 अस्पताल की टीम की हरिंदर कौर मेंटर रही ।
इतनी सराहनीय सेवाओं के लिए उन्हें राष्ट्रपति से पुरस्कार तो मिला ही साथ में अन्य संगठनों ने भी सम्मानित किया है। इंडियन नर्सिंग काउंसिल और ट्रेंड नर्सेज एसोसिएशन भी उन्हें नवाज चुके हैं । नगर निगम मोहाली, सेक्टर 41 बटेरला उनके पैतृक गांव के संगठन , सीनियर सिटीजन एसोसिएशन, मोहाली ने भी उन्हें सम्मानित किया है। सेक्टर 49 के गुरुद्वारा चरण कंवल साहब और सेक्टर 16 अस्पताल के डॉक्टर और अन्य स्टाफ संगठनों ने भी उनका अभिनंदन किया है ।
हरिंदर कौर का कहना है कि पुरस्कार प्राप्ति मेरे जीवन के गौरवपूर्ण क्षण है । मुझे रब से और क्या चाहिए। मेरे काम को मान्यता मिली है । अस्पताल के चिकित्सकों और मेरे साथियों का मुझ पर पूरा विश्वास है इसीलिए कोविड-19 के चुनौतीपूर्ण दौर में मुझे बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी गई और उत्साहित किया गया। राष्ट्रपति महोदय ने पुरस्कृत करने के समय मुझे कहा था कि रिटायरमेंट शब्द कभी जिंदगी में मत लाना और ताउम्र सेवा करते रहना। यह बहुत बड़ी बात है मेरे लिए । मैं भी जिंदा जी महिलाओं के कल्याण और स्वास्थ्य पर ध्यान देती रहूंगी । "रब मैनू समरथा देवे।"
अवतार सिंह भंवरा
आकाश ने अपने दिल में हुआ बड़ा सा छेद दिखाते हुए कहा, तुम्हें शायद मालूम नहीं कि इंसान के स्वार्थ की लपटें कितनी ऊपर तक पहुंच रही हैं।भट्टी में धू –धू जल रहे हैं पुतले, किसी दिन इन्हीं लपटों का शिकार हो जाएगा वह। खतरे का बिगुल बज रहा है और काला धुआं फैलता जा रहा है।
पानी के चेहरे पर उदासी की लकीरें साफ़ दिखाई दे रही थीं। हवा ने पूछा–क्या बात है भाई? मेरा दर्द बहुत पुराना है–पानी बोला ,बरसों से इंसान मेरा खून चूस रहा है।वह जल–भक्षी हो गया है, इतना स्वार्थी कि मेरे शरीर की आखिरी बूंद तक निचोड़ लेना चाहता है।अब और बर्दाश्त नहीं होता।
पानी की दुःख भरी कहानी सुन कर हवा की आंखें भीग गईं –मेरी भी दास्तां कुछ ऐसी ही है भाई।
ये काल, अपभ्रंश की धारा
परिवर्तन की है ये पृष्टभूमि
कर्म -भुमि है ये रण-भूमि
कुरुक्षेत्र ये उदित युग का।
निःशस्त्र तुमको लड़ना है
महीधर बन कर अड़ना है
सुगम भाव से करना तुझे
आगाज़ अविकल्प युद्ध का
अमन-क्रांति के अंकुर सींच
शस्य शांति की उन्नत करना
प्रेम महुर देकर खरपात को
रखना ध्यान आत्म शुद्ध का
अग्रज सहचर अनुज बहुतेरे
वर्य बनके अविज्ञ मन हरना
चक्रव्यूह के षड़यंत्र को भेद
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| सुजाता |
एक आम ग्रामवासी के मुख से सुनिए –
ईश्वर/मेरे दोस्त/मेरे पास आ/यहां बैठ/बीड़ी पिलाऊंगा/चाय पीते हैं । सादगी की यह झलक उनकी और भी कविताओं में मिलती है–‘एक आदमी होता था’ की कुछ पंक्तियां हैं पहले एक पहाड़ होता था/एक आदमी होता था/लेकिन आदमी इतने ज़ोर से बहा /कि नदी सो गई।
‘भोजवान में पतझड़’ में कवि की मानवीय संवेदनाओं का विस्तार झलकता है– लेटी रहेगी एक कुनकुनी उम्मीद/मेरी बगल में/एक ठंडी मुर्दा लिहाफ के नीचे/कि फूट जाएंगी कोंपले/लौट आएगी अगले मौसम तक/भोजवन में जिंदगी।
आदिवासी बहनों के लिए लिखी कविता ‘ब्यूंस की टहनियों ’ में यही संवेदना औरत के प्रति है –जो जितना दबाओ झुकती जाएंगी/जैसा चाहो लचकाओ लहराती रहेंगी/जब सूख जाएंगी कड़क कर टूट जाएंगी।
क्या स्त्री– पुरुष बराबर हैं? क्या सच है कि औरत सामाजिक और आर्थिक शोषण का शिकार नहीं? यह कविता ऐसे कई सवालों पर और बड़ा सवाल खड़ा करती है।
डॉ० आरती कुमारी हिंदी, उर्दू व अंग्रेज़ी में समान अधिकार रखती हैं। वह एक कवि, ग़ज़लगो के साथ शिक्षाविद भी हैं। उनकी कई रचनाएँ व आलेख राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। उनका काव्य संग्रह ' धड़कनों का संगीत' राजभाषा विभाग द्वारा सम्मानित एवं अभिधा प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। उनके संपादन में ये नए मिज़ाज का शहर है और बिहार की महिला ग़ज़लकार ग़ज़ल संग्रह आया है। उनकी रचनाएँ आकाशवाणी और दूरदर्शन से नियमित प्रसारित होती रहती हैं।
स्मृति
आज
कई दिनों बाद
स्मृति के जादूगर ने
पलट डाले
जिंदगी की किताब के
कई पृष्ठ ..
वक्त की स्याही से लिखे
उन पन्नों पर दिखे
अठखेलियाँ करते शब्द
अनुशासित भाव
कुछ स्पंदित क्षण
सूखे गुलाब के निशान
और
आँखों की नमी से धुले
तुम्हारे ख़त...
पुल
विश्वास की ईंटों को जोड़कर
प्यार के गारे से सना
चलो बनाएँ
नाम~ शकुंतला अग्रवाल "शकुन", लघु कथा,व छांदसिक रचनाएँ ।
प्रकाशित कृतियाँ- 1.दर्द की परछाइयाँ (2017),
2. "बाकी रहे निशान" दोहा संग्रह( 2019) ,
3."काँच के रिश्ते" दोहा संग्रह(2020),
4."भावों की उर्मियाँ" कुंडलियाँ संग्रह (2021) 5. 'लघुकथा कौमुदी' लघुकथा संग्रह(2022)
व अनेक साझा संग्रह
प्रकाश्य:-घनाक्षरी,गीत, कविता व एकांकी संग्रह।
सम्मान व अलंकरण - हिंदी दिवस पर जिला साहित्यकार परिषद भीलवाड़ा द्वारा "साहित्य सुधाकर"-2018
विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा~ 'विद्यावाचस्पति' सम्मान-2018 में
द्वारकेश साहित्य परिषद कांकरोली द्वारा सम्मानित- 2019, काव्यांचल ग्रुप- 'छंद-रथी'-2019, व फरवरी 2020 में दोहा शिरोमणि सम्मान व अन्य कई सम्मान।
दोहा
छंदाधारित गीतिका
मैं मूरख कैसे करूँ, शिव जी का गुणगान?
शब्द पड़े हैं मौन सब,नहीं छंद का ज्ञान।
*
नश्वर जग में हो तुम्हीं,सबके तारणहार,
जान गया इस सत्य को,वो सच्चा- इंसान।
*
पग-पग पर धोखे यहाँ,कैसे हो विश्वास?
परख सके सबको 'शकुन',ऐसा दो संज्ञान।
*
माया डसती नित यहाँ, घायल होती रूह,
अनुवाद: सुजाता
कुदरत के रंगों का जलाल था
बराबरी थी,एकरसता थी
पेड़ थे,बूटियाँ थी
स्थान था हरेक वस्तु का
कुदरती रचना थी
नर और मादा होने की
बिलकुल उतने ही बराबर थे सब
जितना बराबर था होना उनका
मनुष्य का आना धरती पर
ले कर आना था
विशेष क़िस्म की समझदारी
समझदारी ने की कुछ बाँटें
निश्चित किये स्थान
सब जीव निर्जीव वस्तुओं के
बंट गया तथ्य होने रहने का
नर और मादा होने में
संतोष कुमार पोखरेल नेपाल के एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध बहुभाषी लेखक और कवि हैं। वह नेपाली, अंग्रेजी, हिंदी और रूसी में लिखते हैं। उनके पास कहानियों और निबंधों सहित हजारों कविताएँ हैं। उन्होंने अब तक छह किताबें लिखी और प्रकाशित की हैं। उनकी रचनाओं का अब तक 29 भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। कवि पोखरेल को विश्व साहित्य में उनके साहित्यिक योगदान के लिए समय-समय पर प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। नेपाली कवि संतोष कुमार पोखरेल को एंटोन चेखव ऑटम 2020, क्रीमिया, रूस द्वारा 'विश्व कवि' की उपाधि से सम्मानित किया गया है। जनवरी 2022 में, कवि संतोष कुमार पोखरेल को यूक्रेन के साहित्यिक फाउंडेशन और 10 देशों के संगठनों द्वारा प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय स्वर्ण कवि पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। फिर से, जनवरी 2022 में, उन्हें इंटरनेशनल सेंटर फॉर पोएट्री ट्रांसलेशन एंड रिसर्च एंड इंटरनेशनल पोएट्री (बहुभाषी), चीन के "जर्नल ऑफ रैंडिसन" द्वारा "द इंटरनेशनल बेस्ट पोएट" की उपाधि से सम्मानित किया गया।
विश्व कवि संतोष कुमार पोखरेल अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मंच के प्रमुख हैं। अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मंच अपना स्वयं का फेसबुक समूह चलाता है और विश्व कविता संग्रह प्रकाशित करता है।
उन्होंने पीपुल्स फ्रेंडशिप यूनिवर्सिटी, मॉस्को से सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल की है। कवि पोखरेल, जिनके पास त्रिभुवन विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की डिग्री है, वे उसी त्रिभुवन विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहे हैं। pokharel.santosh@gmail.com
सेज-ए-जख्म सजाऊँ
सेज-ए-जख्म सजाऊँ
ऊन की गजलें गाऊँ
नींद कहाँ?यादों में खोयी
खुद को ही भूल जाऊँ।
मैं आपकी चुप्पी सुनूंगा
आपको उसमें महसूस और समझ
आपसे कभी दूर नहीं जाएगा
लेकिन मेरे लिए अपना सब कुछ त्याग दो
और अपने दर्द और दुर्दशा को साझा करें
तुम्हारे बिना शून्य में मेरी मदद करो
जितना अधिक हम मिलते हैं, मैं उतना ही मजबूत हूं
आप माइनस रहने का सपना नहीं देख सकते
स्मृति रंजन महान्ति, श्री राज किशोर महान्ति और शान्तिलता महान्ति के सुपुत्र, 1/1/1963 को ओडिशा के जगतसिंहपुर जिले के पदमपुर में जन्मे, एक बहुभाषी कवि, निबंधकार और लेखक हैं जो 'पेंटासी बी वर्ल्ड फ्रेंडशिप पोएट्री' के उल्लेखनीय कवियों में सम्मिलित हैं। उनकी रचनाओं में निबंध, लघु कथाएँ, कविताएँ और उपन्यास शामिल हैं, जो अखबारों और राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं, जरनल और संकलनों में छप चुकी हैं। ओडिशा सरकार के वित्त विभाग में अफसर के तौर पर कार्यरत, वो अधिकांशतः जीवन, उसकी सुंदरता और गूढ़ता पर लिखते हैं, जो व्यापक रूप से प्रसंशित हैं।
और एक बार
सारी स्मृतियां विस्मृत हो जाने के बाद
तुम रहती हो पास पास
स्मृति की प्रचुरता बनकर...
सारे सूर्यों के बुझ जाने के बाद
तुम रहती हो पास पास
हज़ारों मशालें बनकर...
सारे प्राप्तियों के निःशेष होने के बाद
प्रकाशन/संपादन-
बिन्दु में सिन्धु, उन पलों में, शब्द-शब्द क्षणबोध, आर-पार, कई फूल - कई रंग, डॉ. मिथिलेश दीक्षित का क्षणिका-साहित्य, फतेहपुर जनपद के हाइकुकार, डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के सौ शेर, नयी सदी के दोहे, क्षणिका काव्य के हस्ताक्षर, दि अण्डरलाइन क्षणिका विशेषांक, अचिन्त साहित्य दीपावली क्षणिका विशेषांक तथा अन्वेषी के कई वार्षिकांक।
विशेष-
* अनेक यूरोपीय एवं एशियाई भाषाओं यथा ग्रीक, फ्रेंच, जर्मन, चाइनीज, अज़रबैजानी, पुर्तगीज, सर्बियन, क्रोशियन, अरेबिक आदि भाषाओं में कविताओं का अनुवाद।
* टीवी प्रोग्राम यू एण्ड लिटरेचर टूडे, नाइजीरिया द्वारा लिटरेरी आइकॉन घोषित (दिसम्बर 2018)।
* विभिन्न पत्रिकाओं यथा अन्वेषी, गुफ़्तगू, अनुनाद, तख़्तोताज, मौसम, पुरवाई, शब्द गंगा, अरण्य वाणी आदि के लिए पूर्व/वर्तमान में संपादन, सहसंपादन व कार्यकारी संपादन।* हिन्दी और अंग्रेज़ी की देश-विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं-वेबपत्रिकाओं और विविध संकलनों में विभिन्न विधाओं में रचनाएँ प्रकाशित।
* हिन्दी और अंग्रेज़ी की शताधिक पुस्तकों के लिये भूमिका/विमर्श/समीक्षा/आलोचना आदि प्रकाशित।
* द डियर जाॅन शो, वारिंगटन, इंग्लैंड में कविता प्रसारण।
* अनेक साहित्यिक/सांस्कृतिक संस्थाओं में उत्तरदायी पदों पर आसीन।
* एसोसियेट एडिटर- "द वायस ऑफ क्रियेटिव रिसर्च", ई-जर्नल।
* क्षणिकाकार एवं माइक्रोपोएट्री कॉस्मॉस का संपादन।
* गुफ़्तगू तथा अमृतांजलि आदि पत्रिकाओं में वर्तमान में परामर्शदाता की भूमिका में।
* लघुकथा 'छंगू भाई' पर इसी नाम से लघु फ़िल्म का निर्माण।
* बेकल उत्साही सम्मान 2017, साहिर लुधियानवी सम्मान 2021, डॉ. गणेश दत्त सारस्वत सम्मान 2019, काव्यांजलि एवार्ड 2012 तथा सृजनशीलता सम्मान 2017 सहित कुछ अन्य सम्मान।
* विभिन्न सामयिक साहित्यिक मुद्दों पर देश के अनेक शीर्ष साहित्यकारों/विद्वानों के साथ परिचर्चाएँ/चौपालों का संयोजन/प्रकाशन।
* साहित्य एवं संस्कृति से सम्बन्धित विभिन्न नामचीन हस्तियों के साक्षात्कार।
* विभिन्न प्लेटफॉर्मों के माध्यम से हिन्दी एवं अंग्रेज़ी माइक्रोपोयट्री पर विशेष कार्य।
(अध्यक्ष-अन्वेषी संस्था)
विश्वास करो
मैं
असहज हो गया था
उस दिन
तुम्हारी आँखों में आँसू देख कर
सम्भवतः
पहली बार मुझे
लगा था ऐसा
कि तुम्हारे हृदय में
जीवंत सा जीवन
पूछा जो मैंने समंदर से,तेरी मौजौ का मकसद है क्या ?
पलटकर उसने कहा,
जीवन नया हो, मकसद नया हो,
नयी उम्मीदें हो, नयी हो आशायें |
बडी जीवंत सी हो, कुछ आकांक्षायें ।
गम हो या खुशी, ज़िन्दगी हो नयी,
(गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) में जन्म। वर्तमान में चिकित्सक के रूप में झांसी (उत्तर प्रदेश) कार्यरत। विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी के छतरपुर (मध्य प्रदेश) केंद्र तथा स्थानीय ऍफ एम गोल्ड के कार्यक्रमों में रचनाओं का निरन्तर पाठ।कहानी संग्रहरू श्अपेक्षाओं के बियाबानश् काव्य संग्रहरू श्अनुरणनश् प्रकाशनाधीन)
ताजमहल को देखते सैलानी उसके सौंदर्य को अभिभूत निहारते थे। हाथों में लाल चूड़ा पहने एक लड़की ने लड़के के सीने पर सिर रखते हुए कहा - मेरे मरने के बाद तुम भी मुझे यूँ ही जिंदा रखना। बात खत्म होने से पहले ही लड़के ने उसके कोमल अधरों पर अपनी तर्जनी रख दी।।वहीं कुछ दूरी पर कुछ अन्य सैलानी मजदूरों के कटे हाथ और बेगमों की गिनती में उलझे थे। जया की सूनी आँखे माही और परी की तस्वीरें लेते मानस पर टिकी थी। मैं उसके मनोभाव समझ सकती थी।
“देख जया, मैं भी डॉक्टर हूं। तू समझ कि जब साथ काम करते हैं तो आपस में कुछ आत्मीयता स्थापित हो जाती है। जैसे निर्देशक और अभिनेत्री... वैसे ही एक सर्जन और एनेस्थेटिस्ट! इनमें भी साथ काम करते-करते एक सामंजस्य... एक लगाव उत्पन्न हो जाता है...” मैंने उसका हाथ थामते हुए कहा।
“इतनी अधिक आत्मीयता कि माही आपत्तिजनक तस्वीरें मानस को भेज रही है?” जया ने रुंधे गले से कहा।
मैंने आश्चर्य से उसे देखा। एक चुप्पी हम दोनों के अधरों से होती हुई दबे पाँव पेड़ों पर चढ़ी और निरभ्र आकाश तक फैल गई।
वह दुप्पटे से आँखें पोंछ रही थी। यह पिकनिक जया का मन बहलाने के लिए प्लान की गई थी लेकिन माही की उपस्थिति ने उसे दुख ही अधिक दे दिया था।
गुज़रा हुआ ज़माना गुज़रा वक्त चलचित्र है, जैसे संघर्ष अनवरत है, यादों के सताने से हर कोई कोई सकूं मिलता पवित्र सा है, सामान्य वक्त हर ...