Saturday, August 6, 2022

काला धुआं - लघु कथा :- सुजाता


ऊपर बैठे आकाश ने भी उनकी हां में हां मिलाई। हवा, पानी, ज़मीन बोले, तुम तो मज़े में हो भई, इंसान के हाथ तुम तक  नहीं पहुंच सकते।

आकाश ने अपने दिल में हुआ बड़ा सा छेद दिखाते हुए कहा, तुम्हें शायद मालूम नहीं कि इंसान के स्वार्थ की लपटें कितनी ऊपर तक पहुंच रही हैं।भट्टी में धू –धू जल रहे हैं पुतले, किसी दिन इन्हीं लपटों का शिकार हो जाएगा वह। खतरे का बिगुल बज रहा है और काला धुआं फैलता जा रहा है।

पानी के चेहरे पर उदासी की लकीरें साफ़ दिखाई दे रही थीं। हवा ने पूछा–क्या बात है भाई?  मेरा दर्द बहुत पुराना है–पानी बोला ,बरसों से इंसान मेरा खून चूस रहा है।वह जल–भक्षी हो गया है, इतना स्वार्थी कि मेरे शरीर की आखिरी बूंद तक निचोड़ लेना चाहता है।अब और बर्दाश्त नहीं होता।


पानी की दुःख भरी कहानी सुन कर हवा की आंखें भीग गईं –मेरी भी दास्तां कुछ ऐसी ही है भाई।

देवेंद्र कुमार 'अंबर' (हरियाणा) की कवियाएँ

बच्पन से कविता लिखने का शौक रखने वाले देवेन्द्र कुमार (अंबर) ने श्री ओमप्रकाश दहीया गाँव कितलाना जिला भिवानी, हरियाणा के प्रागंण में 10 मई 1978 को जन्म लिया। प्राथमिक शिक्षा गाँव कितलाना की राजकीय प्राथमिक पाठशाला से उत्तीर्ण की व माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा के लिए जवाहर नवोदय विद्यालय देवराला जिला भिवानी मे दाखिला प्राप्त किया। विज्ञान विषय से उच्च माध्यमिक शिक्षा ऊत्तीर्ण कर National Institute of Technology, Kurukshetra से विद्धूत अभियांत्रिकी से स्नातक की उपाधि प्राप्त कर निजी क्षेत्र में बतौर अभियंता कार्य किया । तत्पश्चात स्वयं संचालित निर्माण व अभियंत्रिकी सलाहाकार के रुप में निजी संस्था के तहत सेवा में लगन हैंं । 

*कुरुक्षेत्र ये उदित युग का


ये काल, अपभ्रंश की धारा

परिवर्तन की है ये पृष्टभूमि 

कर्म -भुमि है  ये रण-भूमि 

कुरुक्षेत्र ये उदित युग का।


निःशस्त्र तुमको लड़ना है

महीधर बन कर अड़ना है

सुगम भाव से  करना तुझे

आगाज़ अविकल्प युद्ध का


अमन-क्रांति के अंकुर सींच 

शस्य शांति की उन्नत करना

प्रेम महुर देकर खरपात को 

रखना ध्यान आत्म शुद्ध का


अग्रज सहचर अनुज बहुतेरे

वर्य बनके अविज्ञ मन हरना

चक्रव्यूह के षड़यंत्र को भेद

Monday, July 18, 2022

'अजय' चयनित कविताएं–एक सफ़र- सुजाता


सुजाता 
अजय जी की कविताओं में हिमाचल की मिट्टी की सौंधी गंध है।पहाड़ी गांव , जनमानस , रीति रिवाज़ , परंपराएं ,जीवन शैली उनकी कविताओं में उभर कर आए हैं, लेकिन वे अनुभव और चेतना के परों पर सवार बहुत दूर निकल गई हैं। वे समकाल की बुलंद आवाज़ हैं, जो अपने समय और उससे जुड़े यथार्थ का प्रतिनिधित्व करती हैं।
संग्रह की पहली कविता   ‘प्रार्थना’ में गजब की सादगी है।

एक आम ग्रामवासी के मुख से सुनिए –

ईश्वर/मेरे दोस्त/मेरे पास आ/यहां बैठ/बीड़ी पिलाऊंगा/चाय पीते हैं । सादगी की यह झलक उनकी और भी कविताओं में मिलती है–‘एक आदमी होता था’  की कुछ पंक्तियां हैं  पहले एक पहाड़ होता था/एक आदमी होता था/लेकिन आदमी इतने ज़ोर से बहा /कि नदी सो गई।

‘भोजवान में पतझड़’ में कवि की मानवीय संवेदनाओं का विस्तार झलकता है– लेटी रहेगी एक कुनकुनी उम्मीद/मेरी बगल में/एक ठंडी मुर्दा लिहाफ के नीचे/कि फूट जाएंगी कोंपले/लौट आएगी अगले मौसम तक/भोजवन में जिंदगी।

आदिवासी बहनों के लिए लिखी कविता ‘ब्यूंस की टहनियों ’ में यही संवेदना औरत के प्रति है –जो जितना दबाओ झुकती जाएंगी/जैसा चाहो लचकाओ लहराती रहेंगी/जब सूख जाएंगी कड़क कर टूट जाएंगी।

क्या स्त्री– पुरुष बराबर हैं? क्या सच है कि औरत सामाजिक  और आर्थिक शोषण का शिकार नहीं? यह कविता ऐसे कई सवालों पर और बड़ा सवाल खड़ा करती है।

कविताएँ- आरती कुमारी, बिहार।

डॉ० आरती कुमारी हिंदी, उर्दू व अंग्रेज़ी में समान अधिकार रखती हैं। वह एक कवि, ग़ज़लगो के साथ शिक्षाविद भी हैं। उनकी कई रचनाएँ व आलेख राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। उनका काव्य संग्रह ' धड़कनों का संगीत' राजभाषा विभाग द्वारा सम्मानित एवं अभिधा प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। उनके संपादन में ये नए मिज़ाज का शहर है और बिहार की महिला ग़ज़लकार  ग़ज़ल संग्रह आया है। उनकी रचनाएँ आकाशवाणी और दूरदर्शन से नियमित प्रसारित होती रहती हैं।

स्मृति 


आज

कई दिनों बाद

स्मृति के जादूगर ने

पलट डाले

जिंदगी की किताब के

कई पृष्ठ ..

वक्त की स्याही से लिखे

उन पन्नों पर दिखे

अठखेलियाँ करते शब्द 

अनुशासित भाव

कुछ स्पंदित क्षण

सूखे गुलाब के निशान 

और

आँखों की नमी से धुले

तुम्हारे ख़त...


पुल


विश्वास की ईंटों को जोड़कर

प्यार के गारे से सना

चलो बनाएँ  

दोहा गीतिका- शकुंतला अग्रवाल 'शकुन' , राजस्थान।

 

नाम~ शकुंतला अग्रवाल "शकुन", लघु कथा,व  छांदसिक रचनाएँ ।

प्रकाशित कृतियाँ- 1.दर्द की परछाइयाँ (2017), 

2. "बाकी रहे निशान" दोहा संग्रह( 2019) , 

3."काँच के रिश्ते" दोहा संग्रह(2020),

4."भावों की उर्मियाँ" कुंडलियाँ  संग्रह (2021) 5. 'लघुकथा कौमुदी' लघुकथा संग्रह(2022)

व अनेक साझा संग्रह

प्रकाश्य:-घनाक्षरी,गीत, कविता व एकांकी संग्रह। 

सम्मान व अलंकरण - हिंदी दिवस पर जिला साहित्यकार परिषद भीलवाड़ा द्वारा "साहित्य सुधाकर"-2018

विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा~ 'विद्यावाचस्पति' सम्मान-2018 में

द्वारकेश साहित्य परिषद कांकरोली द्वारा सम्मानित- 2019, काव्यांचल ग्रुप- 'छंद-रथी'-2019, व फरवरी 2020 में दोहा शिरोमणि सम्मान व अन्य कई सम्मान।


 

दोहा


छंदाधारित गीतिका


मैं मूरख कैसे करूँ, शिव जी का गुणगान?

शब्द पड़े हैं मौन सब,नहीं छंद का ज्ञान।

*

नश्वर जग में हो तुम्हीं,सबके तारणहार,

जान गया इस सत्य को,वो सच्चा- इंसान।

पग-पग पर धोखे यहाँ,कैसे हो विश्वास?

परख सके सबको 'शकुन',ऐसा दो संज्ञान।

*

माया डसती नित यहाँ, घायल होती रूह,

Saturday, April 23, 2022

अपनी चाय की चुस्की भरो धीरे_धीरे/ मज़े से : प्रोफ: ली तसु पेंग

अनुवाद: सुजाता

कोई नहीं जानता
कब रुखसत का समय आ जाए और उस मौज को जीने का समय ही न मिले
तो बसअपनी चाय की चुस्की भरो
सुकून से/ धीरे _धीरे
_
जीवन बहुत छोटा है
मगर लगता बेहद लंबा
बहुत कुछ है करने को
क्या सही क्या गलत
उलझे रहते तुम इसी में
इससे पहले कि देर हो जाए और  
अंत समय आ जाए
अपनी चाय का मज़ा लो
घूंट_घूंट
_
चंद दोस्त शेष रहते

कविताएँ : अरतिंदर संधू

 

कुदरत के रंगों का जलाल था 

बराबरी थी,एकरसता थी 

पेड़ थे,बूटियाँ थी

स्थान था हरेक वस्तु का

कुदरती रचना थी 

नर और मादा होने की

बिलकुल उतने ही बराबर थे सब

जितना बराबर था होना उनका 


मनुष्य का आना धरती पर

ले कर आना था 

विशेष क़िस्म की समझदारी 


समझदारी ने की कुछ बाँटें 

निश्चित किये स्थान 

सब जीव निर्जीव वस्तुओं के

बंट गया तथ्य होने रहने का

नर और मादा होने में 

Wednesday, March 2, 2022

सन्तोष कुमार पोखरेल (नेपाल) : कविताएँ

 

संतोष कुमार पोखरेल नेपाल के एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध बहुभाषी लेखक और कवि हैं। वह नेपाली, अंग्रेजी, हिंदी और रूसी में लिखते हैं। उनके पास कहानियों और निबंधों सहित हजारों कविताएँ हैं। उन्होंने अब तक छह किताबें लिखी और प्रकाशित की हैं। उनकी रचनाओं का अब तक 29 भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। कवि पोखरेल को विश्व साहित्य में उनके साहित्यिक योगदान के लिए समय-समय पर प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। नेपाली कवि संतोष कुमार पोखरेल को एंटोन चेखव ऑटम 2020, क्रीमिया, रूस द्वारा 'विश्व कवि' की उपाधि से सम्मानित किया गया है। जनवरी 2022 में, कवि संतोष कुमार पोखरेल को यूक्रेन के साहित्यिक फाउंडेशन और 10 देशों के संगठनों द्वारा प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय स्वर्ण कवि पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। फिर से, जनवरी 2022 में, उन्हें इंटरनेशनल सेंटर फॉर पोएट्री ट्रांसलेशन एंड रिसर्च एंड इंटरनेशनल पोएट्री (बहुभाषी), चीन के "जर्नल ऑफ रैंडिसन" द्वारा "द इंटरनेशनल बेस्ट पोएट" की उपाधि से सम्मानित किया गया।

विश्व कवि संतोष कुमार पोखरेल अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मंच के प्रमुख हैं। अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मंच अपना स्वयं का फेसबुक समूह चलाता है और विश्व कविता संग्रह प्रकाशित करता है।

उन्होंने पीपुल्स फ्रेंडशिप यूनिवर्सिटी, मॉस्को से सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल की है। कवि पोखरेल, जिनके पास त्रिभुवन विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की डिग्री है, वे उसी त्रिभुवन विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहे हैं। pokharel.santosh@gmail.com



सेज-ए-जख्म सजाऊँ 


सेज-ए-जख्म सजाऊँ

ऊन की गजलें गाऊँ

नींद कहाँ?यादों में खोयी

खुद को ही भूल जाऊँ।

प्रसंना कुमार : कविताएँ:

 

एक भावुक भारतीय लेखक-सह-कवि है, जबकि ओडिशा के गंजम जिले में पेशे से अंग्रेजी का एक जबरदस्त व्याख्याता है। वह भारत की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का एक कुशल स्रोत है। रोमांटिक और उदासीन कविताओं पर उनकी नि: शुल्क कविता सभी द्वारा सराहना की। वह ओडिशा राज्य गंजम जिले के एक छोटे से ठेठ गांव नंदीगडा से संबंधित है । वह विश्व साहित्य के आसपास अपने विशिष्ट लेखन को बढ़ावा देता है और कई उपजी है कि वर्तमान मुद्दों से संबंधित है उसके अवलोकन और अनुभवों के आधार पर संबंधित है कि तत्काल ध्यान देने की जरूरत है के साथ ट्रेडों । वह एक पुरस्कार विजेता लेखक है जो दुनिया भर में लेखन के सर्कल से विभिन्न ख्याति हासिल की है । उनकी मुफ्त कविता कविताएं न केवल युवा पाठकों को प्रेरित करती हैं बल्कि वर्तमान समय के लिए भी तैयार हैं । उनका प्रतीक अभी दुनिया भर में दूसरों को प्रेरित कर रहा है, जिनमें से सराहना की कुछ काव्य और उनकी कई कविताओं का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया गया और उन्हें वैश्विक प्रशंसा मिली। भविष्य में उनकी आगामी लेखन और सफलता के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ।

अपने दायरे में!

मैं आपकी चुप्पी सुनूंगा

आपको उसमें महसूस और समझ

आपसे कभी दूर नहीं जाएगा

लेकिन मेरे लिए अपना सब कुछ त्याग दो

और अपने दर्द और दुर्दशा को साझा करें

तुम्हारे बिना शून्य में मेरी मदद करो

जितना अधिक हम मिलते हैं, मैं उतना ही मजबूत हूं

आप माइनस रहने का सपना नहीं देख सकते

कविताएँ: स्मृति रंजन महान्ति

स्मृति रंजन महान्ति, श्री राज किशोर महान्ति और शान्तिलता महान्ति के सुपुत्र, 1/1/1963 को ओडिशा के जगतसिंहपुर जिले के पदमपुर में जन्मे, एक बहुभाषी कवि, निबंधकार और लेखक हैं जो 'पेंटासी बी वर्ल्ड फ्रेंडशिप पोएट्री' के उल्लेखनीय कवियों में सम्मिलित हैं। उनकी रचनाओं में निबंध, लघु कथाएँ, कविताएँ और उपन्यास शामिल हैं, जो अखबारों और राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं, जरनल और संकलनों में छप चुकी हैं। ओडिशा सरकार के वित्त विभाग में अफसर के तौर पर कार्यरत, वो अधिकांशतः जीवन, उसकी सुंदरता और गूढ़ता पर लिखते हैं, जो व्यापक रूप से प्रसंशित हैं।

 

और एक बार

सारी स्मृतियां विस्मृत हो जाने के बाद

तुम रहती हो पास पास

स्मृति की प्रचुरता बनकर...

सारे सूर्यों के बुझ जाने के बाद

तुम रहती हो पास पास

हज़ारों मशालें बनकर...

सारे प्राप्तियों के निःशेष होने के बाद

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' की कविताएँ

प्रकाशन/संपादन- 

बिन्दु में सिन्धु, उन पलों में, शब्द-शब्द क्षणबोध, आर-पार, कई फूल - कई रंग, डॉ. मिथिलेश दीक्षित का क्षणिका-साहित्य, फतेहपुर जनपद के हाइकुकार, डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के सौ शेर, नयी सदी के दोहे, क्षणिका काव्य के हस्ताक्षर, दि अण्डरलाइन क्षणिका विशेषांक, अचिन्त साहित्य दीपावली क्षणिका विशेषांक तथा अन्वेषी के कई वार्षिकांक।

विशेष- 

* अनेक यूरोपीय एवं एशियाई भाषाओं यथा ग्रीक, फ्रेंच, जर्मन, चाइनीज, अज़रबैजानी, पुर्तगीज, सर्बियन, क्रोशियन, अरेबिक आदि भाषाओं में कविताओं का अनुवाद। 

* टीवी प्रोग्राम यू एण्ड लिटरेचर टूडे, नाइजीरिया द्वारा लिटरेरी आइकॉन घोषित (दिसम्बर 2018)। 

* विभिन्न पत्रिकाओं यथा अन्वेषी, गुफ़्तगू, अनुनाद, तख़्तोताज, मौसम, पुरवाई, शब्द गंगा, अरण्य वाणी आदि के लिए पूर्व/वर्तमान में संपादन, सहसंपादन व कार्यकारी संपादन।* हिन्दी और अंग्रेज़ी की देश-विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं-वेबपत्रिकाओं और विविध संकलनों में विभिन्न विधाओं में रचनाएँ प्रकाशित। 

* हिन्दी और अंग्रेज़ी की शताधिक पुस्तकों के लिये भूमिका/विमर्श/समीक्षा/आलोचना आदि प्रकाशित। 

* द डियर जाॅन शो, वारिंगटन, इंग्लैंड में कविता प्रसारण। 

* अनेक साहित्यिक/सांस्कृतिक संस्थाओं में उत्तरदायी पदों पर आसीन। 

* एसोसियेट एडिटर- "द वायस ऑफ क्रियेटिव रिसर्च", ई-जर्नल।

* क्षणिकाकार एवं माइक्रोपोएट्री कॉस्मॉस का संपादन।

* गुफ़्तगू तथा अमृतांजलि आदि पत्रिकाओं में वर्तमान में परामर्शदाता की भूमिका में।

* लघुकथा 'छंगू भाई' पर इसी नाम से लघु फ़िल्म का निर्माण।

* बेकल उत्साही सम्मान 2017, साहिर लुधियानवी सम्मान 2021, डॉ. गणेश दत्त सारस्वत सम्मान 2019, काव्यांजलि एवार्ड 2012 तथा सृजनशीलता सम्मान 2017 सहित कुछ अन्य सम्मान।

* विभिन्न सामयिक साहित्यिक मुद्दों पर देश के अनेक शीर्ष साहित्यकारों/विद्वानों के साथ परिचर्चाएँ/चौपालों का संयोजन/प्रकाशन। 

* साहित्य एवं संस्कृति से सम्बन्धित विभिन्न नामचीन हस्तियों के साक्षात्कार। 

* विभिन्न प्लेटफॉर्मों के माध्यम से हिन्दी एवं अंग्रेज़ी माइक्रोपोयट्री पर विशेष कार्य।

(अध्यक्ष-अन्वेषी संस्था)


विश्वास करो

मैं 

असहज हो गया था 

उस दिन 

तुम्हारी आँखों में आँसू देख कर 

सम्भवतः 

पहली बार मुझे 

लगा था ऐसा 

कि तुम्हारे हृदय में 

कविताएँ: आशा कुमारी

जीवंत सा जीवन 

पूछा जो मैंने समंदर से,

तेरी मौजौ का मकसद है क्या ?


पलटकर उसने कहा,

जीवन नया हो, मकसद नया हो, 

नयी उम्मीदें हो, नयी हो आशायें  |

बडी जीवंत सी हो, कुछ आकांक्षायें ।


गम हो या खुशी, ज़िन्दगी हो नयी,

Saturday, February 12, 2022

देव या देवारि? (कहानी) : -डॉ निधि अग्रवाल


 

(गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)  में जन्म। वर्तमान में चिकित्सक के रूप में झांसी (उत्तर प्रदेश) कार्यरत। विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में  रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी के छतरपुर (मध्य प्रदेश) केंद्र तथा स्थानीय ऍफ एम गोल्ड के कार्यक्रमों में  रचनाओं का निरन्तर  पाठ।कहानी संग्रहरू श्अपेक्षाओं के बियाबानश्   काव्य संग्रहरू श्अनुरणनश् प्रकाशनाधीन)

ताजमहल को देखते सैलानी उसके सौंदर्य को अभिभूत निहारते थे। हाथों में लाल चूड़ा पहने एक लड़की ने लड़के के सीने पर सिर रखते हुए कहा - मेरे मरने के बाद तुम भी मुझे यूँ ही जिंदा रखना। बात खत्म होने से पहले ही लड़के ने उसके कोमल अधरों पर अपनी तर्जनी रख दी।।वहीं कुछ दूरी पर कुछ अन्य सैलानी मजदूरों के कटे हाथ और बेगमों की गिनती में उलझे थे। जया की सूनी आँखे माही और परी की तस्वीरें लेते मानस पर टिकी थी। मैं उसके मनोभाव समझ सकती थी।

“देख जया, मैं भी डॉक्टर हूं। तू समझ कि जब साथ काम करते हैं तो आपस में कुछ आत्मीयता स्थापित हो जाती है। जैसे निर्देशक और अभिनेत्री... वैसे ही एक सर्जन और एनेस्थेटिस्ट! इनमें भी साथ काम करते-करते एक सामंजस्य... एक लगाव उत्पन्न हो जाता है...” मैंने उसका हाथ थामते हुए कहा।

“इतनी अधिक आत्मीयता कि माही आपत्तिजनक तस्वीरें मानस को भेज रही है?” जया ने रुंधे गले से कहा। 

मैंने आश्चर्य से उसे देखा। एक चुप्पी हम दोनों के अधरों से होती हुई दबे पाँव पेड़ों पर चढ़ी और निरभ्र आकाश तक फैल गई।

वह दुप्पटे से आँखें पोंछ रही थी। यह पिकनिक जया का मन बहलाने के लिए प्लान की गई थी लेकिन माही की उपस्थिति ने उसे दुख ही अधिक दे दिया था।

कविताएँ: पंखुरी सिन्हा

 



हामिद कारज़ाई के देश का चुनाव

ख़बरों की विभीषिका इस बीच 

बहुत ज़्यादा रही 

काफी कँपाया ख़बरों ने 

कुछ आदत भी डाल दी 

और कविता दूर रही 

इस भयानक आक्रांत समय से 

बहुत बौद्धिक रही कविता

जबकि दोनों को पढ़ने का वक़्त 

लगभग एक रहा 

लेकिन पढ़े लिखे अक्षरों के बने 

सब कुछ के अचानक बंद होने का भी वक़्त रहा 

कम से कम एक दिन 

जो केवल कहे सोचने को 

हिंसा के कारणों पर

कि इतनी संभ्रांत हो हिंसा 

कि शोध का विषय बन जाए 

हमारे अपने अफ़ग़ानिस्तान में 

काबुली वालों के देश में 

अब्दुमोमिनोव अब्दुल्लाह (उज़्बेकिस्तान) की कहानी: समय के चोर:

 

मेरा नाम डोनियोर है। मेरा पड़ोसी अब्दुल्ला और मैं घनिष्ठ मित्र बन गए हैं। एक दिन हमें मौज-मस्ती करने का कोई तरीका नहीं मिल रहा था। हमारा कोई लक्ष्य नहीं था। हमें नहीं पता था कि क्या करना है। जब हम लकड़ी के टुकड़े से कुछ बना रहे थे तो अचानक मेरे पिता की नींद खुल गई। उसकी आँखें आधी खुली थीं जब उन्होंने कहा:

"अरे, समय के चोर! क्या आप अपना समय बर्बाद कर रहे हैं?"

मुझे अपने पिता के "समय चोरों" का मतलब बिल्कुल भी समझ नहीं आया। मैं पूछना चाहता था, लेकिन वह सो गये।


मेरे दोस्त अब्दुल्ला ने भी पूछा "क्या हम चोर हैं?"

दिन का उजाला हुआ तो वह अपने घर चला गया। मैं भी थक कर सो गया। लेकिन मुझे याद आया कि मुझे स्कूल जाने में देर हो गई थी, इसलिए मैंने जल्दी से अपना चेहरा धोया और जल्दी में चाय पी ली। मुझे याद नहीं है कि मैंने क्या खाया.. मैंने सोचा कि मुझे स्कूल के लिए देर हो जाएगी, लेकिन कक्षा अभी तक शुरू नहीं हुई थी। मेरे कक्षा में पहुंचते ही शिक्षिका अंदर आ गई। हम सभी ने शिक्षिका का सम्मानपूर्वक अभिवादन किया । उन्होंने ने हमें सम्बोधित करते हुए कहा - 

"मेरे प्यारे छात्रों! मैं आपको देखकर बहुत खुश हूं। मेरी खुशी असीम है।"

जैसे ही हमारी शिक्षिका हमें विषय समझा रही थी, मेरे एक सहपाठी ने आकर कहा, "शिक्षिका, मुझे खेद है कि मुझे आज देर हो गई।"

"डोनियोर, अब और देर मत करो।, शिक्षिका ने कहा। "इस बार मैं तुम्हें माफ कर दूंगी, लेकिन अगली बार मैं तुम्हें सजा दूंगी।"

कवियाएँ :- अदिती राणा जम्बाल

 

मजदूर 

आसान नहीं है मजदूर होना

फुटपाथ पर बोरियां ओढ कर सोना।

पत्थरों के महल बनाना

पर खुद का सर ढकने के लिए छत के लिए तरसना ।


लोगों के खाबों को पूरा करने बाला रचयिता बनना

मगर खुद की दो वक़्त की रोटी के लिए मोहताज होना।

हर चीज में अपना पसीना लगाना

फिर भी बिन पैसे बिन रोटी के रह जाना।


पेट की आग के लिए गांव से जाना

सुजाता की दो कविताएँ



वृक्ष का रोमांच


मां चली गई तुम

पर जाते जाते

कई रिश्तों, रस्मों, रहस्यों से

पर्दे उठा गई

तुम्हारे जाने भर की देर थी

उम्र की कितनी सीढियां चढ़ गई मैं

_तैरना था संबंधों के ताल    मेंजलजीवों की कचोट से बचते हुए

चलना था सड़क के बीचों बीच

खुद को बचाते हुए

असीम आकाश में उड़ना था

Wednesday, October 6, 2021

शोषिआत गुस्तामोव की कुछ कवियाएँ

शोषिआत गुस्तामोव उज्बेकिस्तान की  चर्चित कवित्री है जिसका जन्म 1971 में हुआ और उसने 'यूनिवर्सिटी ऑफ हाईअर लिटरेचर' से जर्नलिज्म की डिग्री प्राप्त की। इस समय वह उज्बेकिस्तान के एक समाचार पत्र में मुख्य संपादक के तौर पर काम कर रही हैं।
द हाउस इन द स्काई, रेस्कयू, द मैन्टल, और सम्पादना की अनेक चर्चित पुस्तकें उसके द्वारा रचित हैं। उसने कई देशों में हुए साहित्य सम्मेलनों में न सिर्फ भाग लिया है बल्कि अअन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक इनाम-सम्मान भी प्राप्त किए हैं।


छोड़ रही हुँ ये रास्ते
यह रोज़-रोज़ की भागदौड़
जैसे किसी चित्रकार की कलाकृत से
झलक रही हो थकान

यह मेरी सोच का पक्षी है
य शायद
मेरी माँ का दूध है
जो मुझे लौट आने को 
कह रहा हो।

किसे दोष दूँ, शिकायत करूं
उन पलों की,

Saturday, September 18, 2021

शकुंतला अग्रवाल 'शकुन' (भीलवाड़ा ,राज.) की कुछ कविताएँ


परिचय:

शिक्षा~ एम.ए.राज विज्ञान, व सी. लिब. जन्म~ 17 मार्च 1963 विधा ~ लघु कथा,व  छांदसिक रचनाएँ ।प्रकाशित कृतियाँ-

1.दर्द की परछाइयाँ (2017), 

2. "बाकी रहे निशान" दोहा संग्रह( 2019) , 

3."काँच के रिश्ते"दोहा संग्रह(2020),

4."भावों की उर्मियाँ" कुंडलियाँ  संग्रह (2021)

व अनेक साझा संग्रह

प्रकाश्य:-घनाक्षरी,गीत, कविता,लघुकथा व एकांकी संग्रह। 

सम्मान व अलंकरण - हिंदी दिवस पर जिला साहित्यकार परिषद भीलवाड़ा द्वारा "साहित्य सुधाकर"-2018

विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा~ 'विद्यावाचस्पति' सम्मान-2018 में

द्वारकेश साहित्य परिषद कांकरोली द्वारा सम्मानित- 2019, काव्यांचल ग्रुप- 'छंद-रथी'-2019, व फरवरी 2020 में दोहा शिरोमणि सम्मान व अन्य कई सम्मान।

Shakuntalaagrwal3@gmail.com

आस घटी नहीं

मैं तुम्हें प्यार करती रही,

पल-पल तुम्हें पाने की

चाहत में डूबती रही,

पर तुमतो भोगते रहे जिस्म को,

मैं रूह से रूह के मिलन की आस में,

क्षण -क्षण मरती रही।

तुम अपने अहम में मगरूर रहे,

मैं त्याग की मूरत बनी रही,

तुम्हें कभी तो होगा  अहसास,

हर क्षण मेरे मन में ये आस पलती रही

तुम,बेलगाम -घोड़े से विचरण

करते रहे।

मै खूँटे  से बंधी रही

कभी तो तुम्हें मेरे समर्पण का संज्ञान होगा, 

Saturday, September 4, 2021

दो कविताएं : द विनेसेंटं माईलज


  द विनेसेंटं माईलज (De Vincent Miles)  फ्लिपाइंस की एक प्रसिद्ध कवयित्री एवं लेखिका है। उन की बहुत-सी कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। दो दशकों से अधिक समय से वह अलग-अलग स्कूलों और कालेजों में अध्यापिका के तौर पर काम करती रही है। इस समय वह Department of Education City Schools of Manilaमें बतौर Master Teacher-II  के पद पर काम कर रही है। वह Future University Sudan o Emilio Aguinaldo College, Manila में भी पढ़ाती रही है।

email: smilahgarcia@gmail.com


दिन में 21 सेब

मैं जब पिछली तरफ झाँकती हूँ

कि पिछले कुछ हफ्ते

कैसे फिजूल और वीरान रहे हैं

तो मैं अपने मन अंदर

उम्र भर के साथ का मंत्र दुहराती हूँ-

‘‘प्यार करना और प्यार लेना’’

मैं इसीलिए यहाँ थी।

अब परवाह नहीं

दो कविताएं : शैलेंद्र क र विमल

  गुज़रा हुआ ज़माना गुज़रा वक्त चलचित्र है, जैसे संघर्ष अनवरत है, यादों के सताने से हर कोई कोई सकूं मिलता पवित्र सा है, सामान्य वक्त हर ...