Wednesday, October 6, 2021

शोषिआत गुस्तामोव की कुछ कवियाएँ

शोषिआत गुस्तामोव उज्बेकिस्तान की  चर्चित कवित्री है जिसका जन्म 1971 में हुआ और उसने 'यूनिवर्सिटी ऑफ हाईअर लिटरेचर' से जर्नलिज्म की डिग्री प्राप्त की। इस समय वह उज्बेकिस्तान के एक समाचार पत्र में मुख्य संपादक के तौर पर काम कर रही हैं।
द हाउस इन द स्काई, रेस्कयू, द मैन्टल, और सम्पादना की अनेक चर्चित पुस्तकें उसके द्वारा रचित हैं। उसने कई देशों में हुए साहित्य सम्मेलनों में न सिर्फ भाग लिया है बल्कि अअन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक इनाम-सम्मान भी प्राप्त किए हैं।


छोड़ रही हुँ ये रास्ते
यह रोज़-रोज़ की भागदौड़
जैसे किसी चित्रकार की कलाकृत से
झलक रही हो थकान

यह मेरी सोच का पक्षी है
य शायद
मेरी माँ का दूध है
जो मुझे लौट आने को 
कह रहा हो।

किसे दोष दूँ, शिकायत करूं
उन पलों की,

Saturday, September 18, 2021

शकुंतला अग्रवाल 'शकुन' (भीलवाड़ा ,राज.) की कुछ कविताएँ


परिचय:

शिक्षा~ एम.ए.राज विज्ञान, व सी. लिब. जन्म~ 17 मार्च 1963 विधा ~ लघु कथा,व  छांदसिक रचनाएँ ।प्रकाशित कृतियाँ-

1.दर्द की परछाइयाँ (2017), 

2. "बाकी रहे निशान" दोहा संग्रह( 2019) , 

3."काँच के रिश्ते"दोहा संग्रह(2020),

4."भावों की उर्मियाँ" कुंडलियाँ  संग्रह (2021)

व अनेक साझा संग्रह

प्रकाश्य:-घनाक्षरी,गीत, कविता,लघुकथा व एकांकी संग्रह। 

सम्मान व अलंकरण - हिंदी दिवस पर जिला साहित्यकार परिषद भीलवाड़ा द्वारा "साहित्य सुधाकर"-2018

विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा~ 'विद्यावाचस्पति' सम्मान-2018 में

द्वारकेश साहित्य परिषद कांकरोली द्वारा सम्मानित- 2019, काव्यांचल ग्रुप- 'छंद-रथी'-2019, व फरवरी 2020 में दोहा शिरोमणि सम्मान व अन्य कई सम्मान।

Shakuntalaagrwal3@gmail.com

आस घटी नहीं

मैं तुम्हें प्यार करती रही,

पल-पल तुम्हें पाने की

चाहत में डूबती रही,

पर तुमतो भोगते रहे जिस्म को,

मैं रूह से रूह के मिलन की आस में,

क्षण -क्षण मरती रही।

तुम अपने अहम में मगरूर रहे,

मैं त्याग की मूरत बनी रही,

तुम्हें कभी तो होगा  अहसास,

हर क्षण मेरे मन में ये आस पलती रही

तुम,बेलगाम -घोड़े से विचरण

करते रहे।

मै खूँटे  से बंधी रही

कभी तो तुम्हें मेरे समर्पण का संज्ञान होगा, 

Saturday, September 4, 2021

दो कविताएं : द विनेसेंटं माईलज


  द विनेसेंटं माईलज (De Vincent Miles)  फ्लिपाइंस की एक प्रसिद्ध कवयित्री एवं लेखिका है। उन की बहुत-सी कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। दो दशकों से अधिक समय से वह अलग-अलग स्कूलों और कालेजों में अध्यापिका के तौर पर काम करती रही है। इस समय वह Department of Education City Schools of Manilaमें बतौर Master Teacher-II  के पद पर काम कर रही है। वह Future University Sudan o Emilio Aguinaldo College, Manila में भी पढ़ाती रही है।

email: smilahgarcia@gmail.com


दिन में 21 सेब

मैं जब पिछली तरफ झाँकती हूँ

कि पिछले कुछ हफ्ते

कैसे फिजूल और वीरान रहे हैं

तो मैं अपने मन अंदर

उम्र भर के साथ का मंत्र दुहराती हूँ-

‘‘प्यार करना और प्यार लेना’’

मैं इसीलिए यहाँ थी।

अब परवाह नहीं

Saturday, August 28, 2021

नेपाली कवि सन्देश की कुछ कविताएं

 

सन्देश घिमिरे नेपाल के एक लेखक, कवि, संपादक और अनुवादक हैं। एक लेखक और लेखक के रूप में, उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों के लिए लेख लिखे हैं, जिनमें सृजन पैनिकल (भारत), होमो यूनिवर्सलिस पत्रिका (ग्रीस), साहित्यिक पोर्टल (बाल्कन), सिल्क रोड इंटरनेशनल पोएट्री फेस्टिवल (चीन), एटीयूनिस पत्रिका (अल्बानिया), पोएट्रीज़ाइन शामिल हैं। पत्रिका, डैश पत्रिका, एनहेदुआना का साहित्यिक उद्यान और द पोएट पत्रिका (इंग्लैंड)। उनकी साहित्यिक कृतियों का कई भाषाओं में अनुवाद और प्रकाशन हो चुका है। वह "पीस एंड हार्मनी", "द यूनिवर्स",   " स्काउटर्स मेमोयर" आदि किताबों के लेखक हैं। उन्होंने चितवन सेंट्रल लियो एंड लायंस क्लब, इंटरनेशनल कोऑर्डिनेटर ऑफ साइंसफोरम, इंटरनेशनल के चार्टर्ड सदस्य के रूप में काम किया है। सृजनोत्सव के समन्वयक और राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के समन्वयक। वह ARTDO इंटरनेशनल के आजीवन सदस्य हैं। वह वर्तमान में मदर टेरेसा इंटरनेशनल फाउंडेशन (MTIF) के राष्ट्रीय मुख्य सचिव, ब्रांड एंबेसडर और इकरा फाउंडेशन के नेपाल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कालिका स्कूल इंटरनेशनल एडवाइजरी बोर्ड (KSIAB) के आधिकारिक संयोजक हैं।


प्रकृति माँ
मैं शायद ही कभी खुद को दुख के समय पाता हूँ
न ही मुझे आखिरी बार याद है जब मैं हँसा था
मेरी धरती पर हवाएं हमेशा ठंडी होती हैं
यही कारण है कि मैं मूर्खों की तरह व्यवहार करता हूँ

सपने और इच्छाएं विकल्पों और अवशेषों से भरी होती हैं
आखिर क्या रह जाता है पुण्य का सन्नाटा
माँ प्रकृति आप बहुत प्यारी और दयालु हैं
हालांकि मानवीय इच्छाओं ने आपके आसपास को बर्बाद कर दिया है

एक ज़माना था जब आसमान सख़्त था

Saturday, August 21, 2021

ईवा लिनोय की तीन अनुवादित कवियाएँ

 

ईवा लीनोय का जन्म ग्रीस के शहर जिलोकास्त्रो में 1973 को हुआ। 2002 में उसने एक फ्रेंच अख़बार 'ला लिब्रे जर्नल' में पत्तरकार के तौर पर काम शुरू किया। उसके बाद उसने ऐथनज़ में एक रेडियो प्रोड्यूसर की नौकरी शुरू की। आजकल वह सायप्रस में एक पत्रिका की बाल पन्नो का संपादन कर रही हैं। 

ईवा लिनोय यूनेस्को लोगोस और 'पेनहेलनिक राइटर असोसिएशन' की मेम्बर  भी हैं। उसकी किताबें सायप्रस सरकार द्वारा स्कूल सिलेबस में शामिल की गई हैं। यूरोप की कथाओं पर उसका काम महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध है।


तुम्हारे आतित्व से पहले


तुम मेरी आत्मा में रहते हो

इससे पहले की तुम कुछ कहो

समझ लेती हूँ तुम्हारे शब्द


बहुत वर्ष जिया है सूनापन


सितारों को देख कामना करना

और आशाएँ बनाई रखना


तुम्हारे आने से पहले 

जान लेती हूँ तुम्हारी सुगन्ध

और इससे पहले की तुम कुछ कहो

सुन लेती हूँ तुम्हारी आत्मा की आवाज़


उड़ते पक्षियों को देखो

और चाहना करो


मैं एक घेरा बनाती हूँ

और उसमें देखती हूँ 

तुमको और अपनेआप को

Saturday, January 30, 2021

अशोक कुमार की दो कविताएँ

अशोक कुमार आधुनिक अंग्रेजी एवम हिन्दी के विश्वविख्यात कवि है| इनका जन्म सन 1977 ई.मे टीकरी जिला बागपत मे हुआ था| इन्हे "शान्ति कवि" के रूप मे भी जाना जाता है | इन्हे इनकी कविताओ के लिए राष्ट्रय एवम विश्व- स्तर के सम्मान से भी नवाजा जा चुका है| सम्मत2020 मे इन्हे विश्व शान्ति अभियान के लिए नाईजिरिया एवम मोरोक्को ने पी .एच.डी की मानद् उपाधि से भी नवाजा है |इनकी कविताओ का विश्व की विभिन्न भाषाओ मे जैसे स्पेनिश ,यूनानी ,इटेलियन ,हिबरु आदि मे किया जा चुका है|

 मैं अमर हूँ !


मैं हंसता हूँ, अद्भुत दुनिया के साथ हंसता हूँ


एक सुंदर पक्षी की तरह 


अनंत आकाश में उड़ता हूँ


जितनी अधिक मैं इच्छा करता हूं उतनी 


मैं सौभाग्यशाली आत्मा हूँ

जिसके पास ज्वाला है कमाल है, 


मैं वैसा ही हूँ,


जैसा सूरज चमकता है 


सब कुछ उसकी रोशनी में देखता हूँ


मैं पूरे परिवार को प्यार करता हूँ


और उनके साथ खुश हूँ


सभी की सराहना करता हूँ

Sunday, February 3, 2019

पतझड़ के दरख्तों के साथ एक दिन- जतिंदर औलख


सर्दी का मौसम आपने चरम पर है। पतझड़ बीत रही है। पतझड़ में ना जाने क्यों कभी कभी मन उदास सा हो जाता है, एकेलापन महसूस होने लगता है। बहुत ही सर्द दिन है पर हल्की हल्की धूप दिन के अस्तित्व को सहला रही है जैसे मन में पनप रहे मार्मिक ज़ख्म भरे जा रहे हों।  मैं अपनी बाइक लेकर निकल पड़ा, मैंने मन बना लिया कि पतझड़ के दरख्तों से मिलूंगा उनसे बात करूंगा और उनके कुछ फोटोग्राफ लूंगा।
वैसे मैं बन में कठोर तपस्या कर रहा वो रिखीवर नहीं जो दरख्तों की भाषा जान लेता है। लेकिन ये हर हाल आपके हावभाव समझते हैं

Monday, May 14, 2018

पाँचवा मौसम -- कुंंती

जीवन में न जाने कैसी है कमी
जो अब तक न पूरी हो सकी
जाने कैसी है तलाश
जो आज तक अधूरी ही रही
आखां में सजे सपने नए
जीवन में नए रंग घुले
मगर उन खुशियों के रंग
इन्द्रधनुषी रंगो से न ढले
नयनां की कमान से
बाण तो अनेक चले
मगर कोई चितवन
हदय न बींध सकी

कविताएं - सुजाता


समय के तेवर और तस्वीरें

कितनी ही तस्वीरें हैं
घर में बिखरी हुई
एलबमों में बंद
दीवारों पर टंगी
कैद कुछ चौखटों, अलमारियों, दराजों में
धीमे-धीमे सांस लेतीं
बहुत कम हैं
आँखों की चमक बरकरार जिनमें
अधिकतर तो धुंधला गयीं
सपनों के झुरमुटे में

Sunday, March 4, 2018

कविताएँ--सुरभी आनंद


          दुर्ग जा रही है
  
        कलरव ध्वनियों ने गूँज उठाया 
        जगत जीव द्वंद बनाने का 
        हवन की खुशबू तेरी ओर से आई 
        मुझे अनुभव जगाने का 

        कहीं चावल कहीं गुग्गुल कहीं पुष्प 
        सब बिखरे हैं तेरे विलाप में 
        कंर्दन की आवाज सुन 
        मेरी भाव भंगिमाएं चीख पड़ी 
        तू जा रही है ;विस्मयताद्ध

        आज ज्योत की आजमाइशें 

दो कविताएं : द विनेसेंटं माईलज (अनुवादः देव भारद्वाज)


द विनेसेंटं माईलज ;(De Vincent Miles) फ्लिपाइंस की एक प्रसिद्ध कवयित्री एवं लेखिका है। उन की बहुत-सी कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। दो दशकों से अधिक समय से वह अलग-अलग स्कूलों और कालेजों में अध्यापिका के तौर पर काम करती रही है। इस समय वह Department of Education City Schools of Manila में बतौर Master Teacher-II के पद पर काम कर रही है। वह Future University
Sudan o Emilio Aguinaldo College, Manila में भी पढ़ाती रही है। email: smilahgarcia@gmail.com




दिन में 21 सेब

मैं जब पिछली तरफ झाँकती हूँ
कि पिछले कुछ हफ्ते
कैसे फिजूल और वीरान रहे हैं
तो मैं अपने मन अंदर
उम्र भर के साथ का मंत्र दुहराती हूँ-
‘‘प्यार करना और प्यार लेना’’
मैं इसीलिए यहाँ थी।

दो गज़लें- डॉ: आरती कुमारी,


डॉ० आरती कुमारी
गज़ल

दास्तां इश्क मोहब्बत की सुनाने वाले
 जाने किस देश गए पिछले जमाने वाले।।

कस्मों वादों की रेवायत तो अभी है लेकिन
अब कहाँ लोग हैं, वो वादे निभाने वाले।।

जिंदगी क्या है किसी ने नहीं समझा लेकिन
मौत आती है तो रोते हैं जमाने वाले।।

अब तो पलकों पे भी जलते नहीं अश्कों के चिराग
गर कभी जल भी गए, आए बुझाने वाले।।

Saturday, February 24, 2018

‘चुटकी भर मुस्कान’

जीवन के विभिन्न आयामों में फैलती 
‘चुटकी भर मुस्कान’

जीवन जहाँ प्रकृति से मिला एक अतुलनीय, अद्भूत, विलक्षण, वैभवशाली, महान् मायावी वरदान है, वहीं यह मानव के लिए कठिनाइयों, चुनौतियों, अप्रत्यासित घटनाओं के वशीभूत मिलन व बिछुड़न का स्वर भी पग-पग पर मुखर करता है। जीवन है तो ख़ुशी है, ग़म है। प्यार, मनुहार, टकराव, उपहास, उपालम्ब, यश, अपयश मनुष्य के दैनंदिन व्यवहार को तय करते हैं, उसके सामर्थ्य व वजूद को चुनौती देते रहते हैं। इन सभी झंझावतों के बीच यदि चुटकी भर मुस्कान अधरों पर किसी न किसी रूप में खिलती रहे तो इसमें कोई सन्देह नहीं रह जाता है कि जीवन सहज, सरस व सरल भाव-प्रवृति की ओर उन्मुख रहता है। कवयित्री रश्मि खरबन्दा की काव्य-कृति ‘चुटकी भर मुस्कान’ कुछ इसी तरह की अभिव्यक्ति लिए हुए है।
समीक्ष्य काव्य-संग्रह में 73 कविताओं का समावेश है, जो कि मानव-जीवन के विभिन्न आयामों, झंझावतों व उबड़-खाबड़, पथरीले तो गरम रेतीले रास्तों के यथार्थबोध से अवगत कराती हैं तो जीवन के उज्जवल पक्ष प्यार, हास-परिहास, स्नेह, वात्सल्य, रिश्तों की माधुर्यता का सोपान भी कराती हैं। काव्य-कृति का शीर्षक मनमोहक वजीवन के प्रति सकारात्मक सन्देश देता है। शीर्षक में निहित भाव, विषम परिस्थितियों के बीच चुटकी भर मुस्कान बनाए रखना, कवयित्री के काव्य-स्वभाव के साथ-साथ उसके व्यवहारिक पक्ष को भी उजागर करता है। 
अब शीर्षक की बात चल निकली है तो क्यों न इस समीक्ष्य कृति की शीर्षक कविता पर आया जाए। पृष्ठ 26 पर

सम्पादकीय- जतिंदर औलख

 समाज और साहित्यः


साहित्य समाज का अभिन्य अंग होना चाहिए और साहित्य ही इंसान में इंसानियत का संचार करता है। साहित्य चाहे मौखिक हो या लिखत इंसान के अंदर ज्ञान की जोत प्रकाशमान करता है। वही समाज विकसित होता है जो ज्ञानवान इंसानो से भरा हो। साहित्य हमेशा मनों में ज्ञान की रौशनी करता है। 
आज सुख-सहूलियत के सारे साधन मौजूद हैं फिर भी हर मन किसी ना किसी कारणवश बैचौन है। हर इंसान ज्यादा से ज्यादा हासिल करना चाहता है। हर जाति, धर्म और वर्ग अपने-अपने लिए और ज्यादा सुविधाएं हासिल करने में जुटे है।  इंसान बैचौन है तो समाज बिखराव की और बढ़ रहा है ऐसे में मानवीय सोच में क्रांतिकारी बदलाव की जरूरत है जो साहित्य ही ला सकता है। मात्र यही एक राह है जो सृष्टि और इंसान के बीच की बढ़ती दूरी को कम कर सकता है।
पंजाबी में हमने दस वर्ष पहले ‘मेघला’ का आरम्भ किआ जो आज पंजाबी साहित्य में एक अलग मुकाम विकसित कर चुका है। हम खुश हैं के आज यही प्रयास हिंदी में शुरू करने की प्रसन्ता ले रहे हैं जिसमे हमारी कोशिश होगी के मयारी रचनाएँ प्रकाशित कर पाठकों को साहित्य के साथ जोड़ा जाए।  
यह पहला अंक है, जो भी हमसे हो पाया स्वीकार कीजिएगा। देश भर से दोस्तों- लेखकों का भरपूर सहयोग

जिज्ञायासा खरबंदा,

जिज्ञायासा खरबंदा, शिक्षा : दसवीं (अध्ययनरत), सम्मान : ’सक्सेसर ऑफ फ्रीडम फाईटर एसोसिएशन’ एवं ’आचार्यकुल चण्डीगढ़’ द्वारा सम्मानित। अन्य : मंथन साहित्यिक संस्था चण्डीगढ़ की सदस्य। राष्ट्रीय कवि संगम, चंबा में सम्मिलित। अखिल भारतीय हिंदी.उर्दु कवि सम्मेलन में शामिल। एन.बी.टी. की पत्रिका में कविता प्रकाशित। दूरभाष : 9872221465
जिज्ञायासा खरबंदा,
कविता


अध्यापक
वह बहुत समझदार है।
उसे किताबें पढ़ना नहीं आता
पर,
वह लागों को,
अच्छे से पढ़ लेता है;
एक वक्त ही रहा उसका
बिन-माँगा, अनचाहा 
अध्यापक!

ऐतिहासिक मंथन
म्ेरे देश के भविष्य
और मेरे देश के इतिहास

कविताएं -बिरेन्द्र शर्मा ’वीर’

बिरेन्द्र शर्मा ’वीर’’

बिरेन्द्र शर्मा ’वीर’, पिता श्री सुरेश चन्द मोद्गिल, माता श्रीमती कृष्णा देवी, जन्म 9 फरवरी 1974, शिक्षा विश्वविद्यालय :स्नातकोŸार (कला) हिमाचल प्रदेश, संप्रतिः मैनेज़र बिज़नेस डवेलपमेंट, अवार्ड : हरफनमौला स्वयंसेवी 1997 एवं बैस्ट बल्ड डोनर 1998 (हि.प्र)

पहाड़ बोलते हैं


कौन कहता है
पहाड़ नहीं बोलते,
बोलते हैं पहाड़
और
बुलंद आवाज़ में बोलते हैं !

सर-सर करती हवा
उनसे बातें करती है 
झर-झर झरता झरना 
उनको गीत सुनाता है
कल-कल करती नदियाँ 
उनके किनारे पनपी
कई सभ्यताओं का इतिहास बताती हैं
और

दो कविताएं : शैलेंद्र क र विमल

  गुज़रा हुआ ज़माना गुज़रा वक्त चलचित्र है, जैसे संघर्ष अनवरत है, यादों के सताने से हर कोई कोई सकूं मिलता पवित्र सा है, सामान्य वक्त हर ...